Tuesday, January 8, 2008

लालु की रेल गाडी छुक- छुक

नमस्कार,

पुनः माफ़ी चाहती हुं इतने दिन चिठ्ठाकारी से दुर रहने के लिये,नया वर्ष आ ही गया है तो क्युं ना पिछ्ले वर्ष का आकलन कर लें?
इस पुरे साल याने की २००७ मे मैनें भारत भ्रमण किया..पुणे, गुडगांव,दिल्ली,जबलपुर,इन्दौर,गोवा,हैदराबाद आदि । और भ्रमण का जरिया हमारी भारतीय रेल रही किसी भी अन्य सामान्य भारतीय की तरह । आप बोलेंगे की अपने आप को सामान्य घोषित कर रही है इस चिठ्ठे के जरिये तो ऐसा नही है  क्युंकी जिस विषय पर मै चर्चा करने वाली हुं वह एक सामान्य भारतीय नागरीक से जुडा है ।

हमारे माननीय रेल मंत्री लालु यादव जी ने तो झंडे गाड दिये, इतिहास मे सबसे अधिक फ़ायदा करवाने वाला रेल बजट बना कर और फ़ायदा कमा कर ।
लालु इतने मशहुर हो गये है कि आई. आई. एम में जा कर प्रबंधन के गुरुओं और उनके शिष्यों को ग्यान दे आये । ये बात अलग है कि ये कोइ नही जानता कि उन्होनें वहां कौन सा ऐसा मंत्र बताया जो आम जनता कभी नही जान पायेगी।
शायद मै जान गयी हुं, अपने आकलन से जो मैने भारत भ्रमण के दौरान किया । ये गलत भी हो सकता है और सही भी, निर्णय आप पर निर्भर है ।

सामान्य जनता को मैनें कभी भी यात्रा की योजना ९० दिनों पहले बनाते देखा, अगर घर में विवाह,मुंडन,तिर्थयात्रा,इत्यादि ना हो । लेकिन अगर लालु के रेल राज की बात करें तो यदि आप को वाजिब दामों पर यात्रा करनी है तो आपको आपका किसी कंपंनी में साक्षात्कार भी ३ महिने पहले से करवाने के लिये जोर देना होगा, नही तो जाओ तत्काल में …किसने रोका है ?
इसके अलावा लालु जी ने जनता की इस असुविधा का ख्याल रखते हुये तत्काल की सिटें भी बढा दी है…क्या बात है ! इसके पहले तो किसी रेल मंत्री ने जनता का इतना खयाल नही रखा ।
अगर आप को कोई सामान भेजना है इस शहर से उस शहर तो मालभाडा भी पहले की तरह नही रहा… हर चीज की किमत ७५% तक बढा कर लालु जी हिरो बन गये हैं ।
रेल का खाना, पानी आदि सभी की किमतें बढा कर , इसमें कौन सी बहादुरी दिखाई है पता नही?
मध्यमवर्ग का ध्यान रखा गया है वातानुकूलित डब्बों की किमतें घटा कर, लेकिन मुझे इसमे भी कोई तुक नज़र नही आता….अरे भाई आप तो उनकी ही मदद कर रहे हो जो पैसा दे सकते हैं, उनका क्या जो अब भी इतना पैसा नही दे सकते.. उपर से ये तत्काल ने तो जान ले ली है ।
एक यात्री जो पुणे से यात्रा शुरु करता है और उसे ईटारसी उतरना है, लालु जी की ईछ्छानुसार ३ महीने पहले से आरक्षण नही करवा पाया तो उसे तत्काल के नियमों के अनुसार पुणे से पटना याने की ट्रेन जहां से शुरु होती है, से जहां उसका आखिरी पडाव है ,तक का टिकीट लेना होगा ।
तो वो यात्री तो उतर गया ईटारसी में, अब सीट तो आरक्षित है, लेकिन खाली कैसे जा सकती है? बस तो फिर…एखाद स्टेशन के बाद वो दी जायेगी किसी और यात्री को जो पुनः इसी ३ महिने के फार्मुले का शिकार है और प्रतिक्षासुची में शायद पहला या आगे का स्थान पाने में सफ़ल हो गया ।

तो इस तरह रेल विभाग ने दोनों तरफ़ से कमाई की, जनता को अछ्छे से लुट कर ।

अब आप बताईये मैं कहां गलत हुं?

ज्यादा फ़ायदा दिखा कर लालु जी ने ना सिर्फ़ जनता, बल्कि अन्य राजनीतीक पार्टियों को भी मजबुर कर दिया है की अब वो घाटा नही दिखा सकते यदी सत्ता में आते हैं तो…. इस तरह यह बात पक्की हो जाती है कि इन नियमों में बदलाव नही होगा , यदि अन्य पार्टियों को यह तिकडम समझ भी आये ।

मैं जानती हुं कि काफ़ी पाठक मेरे इस विचार से तकल्लुफ़ नही रखते होंगे, लेकिन मैनें जो भुगता वो लिखा…आपका क्या विचार है ?

3 comments:

सचिन लुधियानवी said...

बढिया धडगडम धडगडम धडगडम..... पींईईईईईईईईईईई

उन्मुक्त said...

मुक्ता जी, क्या अच्छा हो कि आप और नियमित रूप से लिखें। जो नियमित नहीं लिखते उनको लोग अक्सर भूल जाते हैं।

संपादक said...

when ever i loged in to internet, i always read your blog and i find some fantastic writtings. so keep writing.